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हरदोई,पुलिस उपाधीक्षक सी ओ शाहाबाद का कार्यालय बद इंतजामी का शिकार.

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हरदोई,पुलिस उपाधीक्षक सी ओ शाहाबाद का कार्यालय बद इंतजामी का शिकार


हरदोई।क्षेत्राधिकारी/पुलिस उपाधीक्षक शाहाबाद का कार्यालय बद इंतज़ामी का शिकार हो गया है।जिसकी वजह से फरियादी मारे मारे घूमते रहते हैं।इस दफ्तर का सेवा निवृत्त पेशकार राम सिंह भले ही अब दफ्तर में न हो परंतु जो अन्य आरक्षी हैं, वे फरियादी/ पीड़ित व्यक्ति से सीधे मुंह बात तक करना पसंद नहीं करते।सी ओ दफ्तर में तैनात आरक्षी कहते है कि सी ओ साहब श्रीमान विशाल यादव के दफ्तर में बैठने का कोई निर्धारित समय न होने की वजह से उन्हें अनावश्यक श्रम करना पड़ता है।जब कोई फरियादी अपनी शिकायत किसी उच्चाधिकारी से करने का प्रयास करता है तो वे स्वयं उसे समझा बुझाकर लौटा देते हैं।जिसकी वजह से इस दफ्तर में तमाम प्रकरण महीनों से लंबित है।जब इस संबंध बातचीत की गई तो सी ओ शाहाबाद के दफ्तर में तैनात आरक्षियों ने बताया कि स्टाफ कम है और काम बहुत ज्यादा है।

इन हालातों से न केवल पीड़ित आम आदमी परेशान है वरन थाना पाली,मझिला,पचदेवरा एवं कोतवाली शाहाबाद के पुलिस कर्मी तक परेशान हैं।

यहां गौरतलब है कि पुलिस का काम कानून और व्यवस्था के तंत्र को सुधारना है न कि उसे बिगाड़ना। लेकिन पुलिस के संदिग्ध क्रियाकलापों से न केवल कानून और व्यवस्था की स्थिति बिगड़ती है, बल्कि जनता के बीच उसकी छवि भी धूमिल होती है। यह सुनिश्चित करना पुलिस का कर्तव्य है कि समाज में अनावश्यक बर्दी का डर भी पैदा न हो और कानून व्यवस्था भी बनी रहे।

समय समय पर पुलिस बल को और अधिक संवेदनशील और जिम्मेदार बनाने की जरूरत पर जोर दिया गया। पुलिस बल में सुधार की जरूरत काफी समय से महसूस की जा रही है। इस दिशा में कई स्तरों पर काम भी हो रहा है, लेकिन अपेक्षित नतीजे देखने को नहीं मिल रहे। यही कारण है कि एक तरफ क्षेत्रीय सुरक्षा की चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं, तो दूसरी तरफ जनता के बीच पुलिस की छवि भी लगातार खराब होती जा रही है। यह शर्मनाक है कि कई मामलों में पुलिस अमानवीयता की हद पार कर देती है। इस दौर में सबसे बड़ा सवाल यह है कि पुलिस कब तक अमानवीय बनी रहेगी? पुलिस की कार्यप्रणाली आम आदमी को कोई राहत नहीं दे पाती है। इसका सीधा प्रभाव कानून-व्यवस्था पर पड़ता है। इसीलिए समय-समय पर पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठते रहे हैं।


आए दिन ऐसी घटनाएं सामने आती रहती हैं, जो यह सिद्ध करती हैं कि पुलिस में धर्य और विवेक जैसे मानवीय मूल्यों की भारी कमी है। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि पुलिस अनेक तौर-तरीकों से समाज में बेवजह खौफ पैदा करने की कोशिश करती है। इसी से यह सवाल खड़ा होता है कि पुलिस की भूमिका एक रक्षक की है या फिर भक्षक की? इस माहौल में यह जरूरी हो गया है कि सरकार पुलिस बल को सुधारने की तीव्रता से पहल करे। वहीं दूसरी ओर पुलिस के व्यवहार को सुधारने पर भी काम करना होगा। तभी पुलिस बल में सुधार का असली उद्देश्य पूर्ण हो पाएगा।

 समाज के नैतिक मूल्यों को देखने वाली पुलिस को अपने नैतिक मूल्यों पर भी ध्यान देना चाहिए।

पुलिस को कानून और व्यवस्था की स्थिति पर जरूर ध्यान देना चाहिए, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि आम आदमी पर अत्याचार किया जाए।


ऐेसा नहीं है कि पुलिस सराहनीय कार्य नहीं करती। वह अच्छे काम भी करती है, लेकिन पुलिस का अमानवीय चेहरा और व्यवहार उसके अच्छे कामों पर भारी पड़ता है। अपने इसी व्यवहार के कारण ही पुलिस जनता के बीच विश्वसनीय छवि नहीं बनाई पाई है।


हरदोई जनपद में व्यस्त चौराहों पर ट्रक ड्राइवर पुलिस वालों को सौ - पचास रुपए देकर आगे निकल जाते हैं। पुलिस के इन क्रियाकलापों को देख कर समाज में यह धारणा बन गई है कि अपराधी और धनाढ्य लोग पैसे देकर पुलिस को अपने प्रभाव में लेने की कोशिश करते हैं। पुलिस द्वारा गरीब और बेबस लोगों की एफआइआर न लिखे जाने की घटनाएं तो आम बात हैं। पुलिस एक आम आदमी से ऐसे बर्ताव करती है जैसे वह कोई बड़ा अपराधी हो। सवाल यह है कि मानवीयता की रक्षा करने वाली पुलिस खुद इतनी अमानवीय कैसे हो जाती है?

 ह्यूमन राइट वाच के शोध में बताया गया है कि पुलिस बड़े पैमाने पर मानवाधिकारों का उल्लंघन करती है। पुलिस प्राथमिक रूप से किसी भी समस्या का हल दुर्व्यवहार और समाज में डर बैठा कर करना चाहती है। दुर्व्यवहार पुलिस की संस्थागत समस्या है और सभी सरकारें इस समस्या को दूर करने में नाकाम रही हैं।शोध में मुख्य रूप से चार बिंदुओं पर ध्यान देने की बात कही गई थी। ये चार बिंदु हैं- अपराधों के विश्लेषण में पुलिस की असफलता, झूठे आरोप लगा कर गिरफ्तारी, दुर्व्यवहार और यातना देने की आदत और फर्जी मुठभेड़।

दरअसल, अनेक बार सत्ता अपने हित के लिए पुलिस का इस्तेमाल करती है। ऐसी स्थिति में भी पुलिस का रवैया एकपक्षीय हो जाता है और वह न्याय नहीं कर पाती। इसलिए पुलिस की नकारात्मक भूमिका के लिए अनेक कारक जिम्मेदार हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बहरहाल, पुलिस को अपनी छवि सुधारने के लिए अपने भीतर मानवीय मूल्यों का विकास करना होगा। पुलिस का काम आम आदमी को डराना-धमकाना नहीं है, बल्कि उसके पक्ष में खड़ा होना है। पुलिस बल के सुधार की प्रक्रिया में अनेक स्तरों पर कार्य किए जाने की सामयिक आवश्यकता है। सन 1861 में बने पुलिस एक्ट की भी समीक्षा करने का समय आ गया है।यहां उल्लेखनीय है कि सी ओ विशाल यादव की ए एस पी के पद पर पदोन्नति हो चुकी है।आम जनमानस में उनकी छवि उत्कृष्ट है।परंतु सी ओ दफ्तर में तैनात स्टाफ बहुत गैर जिम्मेदार है।जिसकी वजह से लोगों को खासी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। जानकारों का कहना है कि जब कोतवाली,थानों आदि का समय समय पर पुलिस अधीक्षक द्वारा निरीक्षण किया जा सकता है तो क्षेत्राधिकारी के कार्यालय का निरीक्षण क्यों नहीं किया जाता?

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