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सिधौली,मीडिया को बदनाम करती दलाल पत्रकारों की टोली-पक्षकारिता से बदनाम हो रही है पत्रकारिता.

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सिधौली,मीडिया को बदनाम करती दलाल पत्रकारों की टोली-पक्षकारिता से बदनाम हो रही है पत्रकारिता

रिपोर्ट, गुरुप्रीत सिंह

सिधौली सीतापुर पत्रकारिता की दो धारा है. एक मिशन है और इसे पत्रकारिता कहते हैं. दूसरे को पक्षकारिता कहा जाता है. पत्रकारिता करने वाले पत्रकार मुफलिसी में जीते हैं. अफसर एवं राजनेता के निशाने पर होते हैं. इसके विपरीत पक्षकारिता करने वाले हर वर्ग के प्रिय होते हैं. अफसर और राजनेता उन्हें खूब पसंद करते हैं. ऐसे लोग उनकी गोद में बैठकर मलाई खाते हैं.

ऐसा कहा जाता है कि पत्रकार कभी पक्षकार बन नहीं सकते हैं. पक्षकारों को पत्रकारिता से कोई सरोकार नहीं है. इस स्थिति के मद्देनजर लोग पक्षकारिता को लोकतंत्र के पांचवे स्तम्भ का दर्जा दि‍ये जाने की वकालत भी करते हैं, ताकि वे खुलकर के साथ नेता, अफसरों की चापलूसी एवं दलाली कर सकें. आम जनता को खुलकर लूट सकें.

प्रदेश में वर्तमान में पत्रकारिता संक्रमण के दौर से गुजर रही है। पत्रकारिता के मापदंड खत्म हो चुके हैं, लोग अमर्यादित पत्रकारिता कर रहे है साथ ही देशहित समाजहित सर्वोपरि की अवधारणा खत्म होकर अब जेबहित की पत्रकारिता हो चली है। साथ ही संगठनात्मक संरक्षण में पलते ब्लेकमेलर भी पत्रकार कहलाने लगे हैं। बिना किसी मापदण्ड के चल रहे इस धंधे में (जी हाँ इसे अब धंधा ही कहना पड़ेगा) उतरना हर किसी के लिए आसान हो गया है।

वहीं राजनीतिक संरक्षण में पत्रकारिता करने वालों की वजह से असल पत्रकार कहीं खो गया है। अब समय आ गया है कि हमे पत्रकारिता को बचाने के लिए मुहिम चलाना होगी। पत्रकारिता में हनन होते मूल्यों को पुनः संजोना होगा। व्यवसायीकरण के दौर में आज प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सब सिर्फ व्यवसाय आधारित पत्रकारिता कर रहे हैं, बावजूद इसके प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रानिक मीडिया ने चाहे अपना वजूद बरकरार रखने के लिए ही पर कुछ मूल्यों का निर्धारण किया हुआ था। किंतु अब पत्रकारिता के नाम पर छलावा करने के लिए इलेक्ट्रानिक मीडिया का स्थान यूट्यूब चैनल और प्रिंट मीडिया का स्थान वेबसाइट्स ने ले लिया है।


बिना किसी सरकारी निगरानी समिति के चल रहे यूट्यूब चेनल्स ओर उनमे चल रही मूल्यहीन पत्रकारिता की बानगी बनी खबरों के कारण पत्रकारों की अहमियत कम होती जा रही है।

असल पत्रकारों और "कमाई का जरिया में फर्क नही रह गया है।


अब समय आ गया है पत्रकारिता के मापदंड तय होना चाहिए , पत्रकारों की एक भीड़ सी हो गयी है, जिसमे पत्रकार खो गया है। सरकार ने जनसम्पर्क विभाग तो बनाया लेकिन पत्रकारों के लिए कोई मापदण्ड तय नही किए, पत्रकार किसे माना जाए ? क्या हाथ मे माइक आईडी ही पत्रकारिता का तमगा बन गया है

आज की तारीख में पत्रकारों के लिए एक छोटी सी परीक्षा अनिवार्य हो गयी है। एक जमाना था जब हम किसी अखबार संस्थान में जाते थे तो वो यह देखते थे कि खबरें लिखना भी आता है या नही, खबर की परिपक्वता, उस खबर का क्या असर होगा?, समाज पर क्या असर पड़ेगा ?, इन सब बातों का अनुभव व्यक्ति में है या नही? इसके बाद एक विषय दिया जाता था जिस पर खबर बनाई जाती थी और वो खबर उनके मापदण्ड में खरी उतरी या नहीं? यह देखा जाता था। परन्तु वर्तमान दौर में यह देखा जाने लगा है कि यह व्यक्ति महीने में कितने कमाकर संस्थान को दे सकता है? यह देखा जा रहा है। वो पैसा कहां से ला रहा? उसका तरीका क्या है ? समाज मे उसके इन तरीकों से क्या असर पड़ रहा है कोई नही देख रहा।

अब तय होना चाहिए कि खबरें किस परिमाप में लिखी जाए?

या फिर सरकार पत्रकारों का एक निश्चित मापदण्ड तय करे कि बिना किसी दस्तावेज के लिखित परीक्षा आयोजित हो और निर्धारित अहर्ताओं को पूर्ण करने वाले को ही योग्यताओं के आधार पर पत्रकार माना जाए।


आज सिर्फ हाथ मे डंडा पकड़ कर ब्लैकमेलिंग करने वाले संगठनों के संरक्षण में पत्रकार सुरक्षा कानून की बात करते हैं। जबकि असली पत्रकार किसी सुरक्षा का मोहताज नही है। बावजूद इसके सरकार पत्रकार सुरक्षा कानून लागू करती है तो उसे पत्रकार किसे माना जाए यह मापदण्ड भी तय करने होंगे अन्यथा आगामी समय में पत्रकारिता का दुरुपयोग ओर ज्यादा बढ़ जाएगा।

पत्रकारिता के नाम पर पूरे देश में एक लचर व्यवस्था कायम हो गई है जिसका खामियाजा आम जनता के साथ शासन प्रशासन को भी भुगतना पड़ रहा है वह यह निर्णय नहीं ले पा रहे हैं कि वास्तविक पत्रकारिता और दिखावटी पत्रकारिता में अंतर क्या है?

यूट्यूब पर सोशल साइटों पर खबर लिखने का अधिकार आखिर किसने और कैसे दिया बिना पैमाने के पत्रकारिता का बेड़ा गर्क  करने में कुछ असामाजिक तत्व पिछले कई सालों से लगे हुए हैं जो फेसबुक व्हाट्सएप यूट्यूब पर ग्रुप बनाकर जनता और अधिकारियों पर धाक जमाते हुए असामाजिक कार्यों को बढ़ावा दे रहे हैं.

वैसे भी फर्जी पत्रकारों की बढती तादात ने पत्रकारिता छवि को धूमिल कर दिया है। इसमें हैरानी का विषय यह है कि अपने आप को स्वंयभू पत्रकार घोषित करने वाले पत्रकारों की शैक्षिणकता पर ही प्रश्रचिन्ह नही बल्कि इनकी कार्यशैली भी संदेह के घेरे में रहती है। यह स्थिती बडी गम्भीर है ,क्योकि आगामी भविष्य में इसके दूरगामी नकारत्मक परिणाम से मीडिया गु्रप ही नही बल्कि प्रोफशनल पत्रकार भी अछूते नही रह पायेगे।

*जनता और प्रशासनिक अधिकारियों को फर्जी पत्रकार करते हैं गुमराह

वर्तमान स्थिती यह हो गई है कि नॉन-प्रोफशनल फर्जी पत्रकारों ने जनता और प्रशासनिक अधिकारियों  को इस तरह से भ्रमित कर दिया है की वह सही और गल्त का अनुमान ही नही लगा पा रहे है। उन्हे इस बात का अदांजा भी नही है कि वह इन फर्जी पत्रकारों के भम्रजाल में फसते जा रहे है।

बिना मापदंड  के पत्रकारिता और अनुभवहीन यह पत्रकार अक्सर सभी जगह आसानी से देखे जा सकते है। फिर वह कोई सार्वजनिक मंच हों या फिर व्यक्तिगत कार्यक्रम अक्सर इनकी नकारत्मकता की छाप वहा आसानी से देखी जा सकती है। इसमें हास्यपद यह है कि इस तरह के फर्जी पत्रकार के वास्तिवक कार्य की बात की जाए तो यह नगण्य के समकक्ष है।

सोशल मीडिया का जमकर उठाया जा रहा है नाजायज फायदा

सोशल मीडिय़ा और डिजिटल तकनीक का इनके द्वारा जमकर फायदा उठाया जा रहा है। इस माध्यम को इनके द्वारा बखूबी से इस्तेमाल किया जा रहा है। लोगों को भ्रमित कर सोशल मीडिया माध्यम से, न्यूज पोर्टल के जरिए असवैधानिक तौर पर माईक आईडी इस्तेमाल कर, जो मायाजाल इनके द्वारा फैलाया जा रहा है

वह इलैक्ट्रोनिक मीडिया को भी शर्मशार कर रहा है। किसी भी परिस्थिति को वीडियो  या फोटो से जोड़कर गलत तरीके से  खबरों को चलाने धमकाने और उगाही में बढ़-चढ़कर इस तरह के स्वयंभू पत्रकार यूट्यूब फेसबुक व्हाट्सएप ग्रुप का भी भारी मात्रा में दुरुपयोग कर रहे हैं.

लोगों से अवैध वसूली कर रहे यह लोग पत्रकारिता के स्तर को निम्न करने में लगे हुए है।

 जिसका खामियाजा सही और प्रोफशनल पत्रकार भुगत रहे है। अब देखना यह है कि इस तरह के फर्जी पत्रकारों के जमावडे के रोकथाम के लिए प्रशासन क्या कर सकता है।

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