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सीतापुर,जरूरी सावधानी अपनाएं, खुद के साथ परिवार को फ़ाइलेरिया से बचाएं .

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सीतापुर,जरूरी सावधानी अपनाएं, खुद के साथ परिवार को फ़ाइलेरिया से बचाएं 

फाइलेरिया के चलते बड़ी संख्या में दिव्यांग हो रहे लोग 

- हिन्द इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में पाथ संस्था के सहयोग से सेमिनार कार्यशाला आयोजित का हुआ आयोजन 


सीतापुर, 24 6 सितंबर। हिन्द इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज और पाथ संस्था के संयुक्त तत्वावधान में शुक्रवार को अटरिया अटिरया स्थित हिन्द इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के सभागार में फाइलेरिया को लेकर कार्यशाला एक वर्कशाप का आयोजन किया गया। जिस कार्यशाला में हिन्द हॉस्पिटल और पाथ संस्था के चिकित्सकों के साथ ही मेडिकल के विद्यार्थियों ने भी प्रतिभाग किया। दीप प्रज्ज्वलन और सरस्वती वंदना के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया। पहले सत्र की अध्यक्षता डॉ. कर्नल विजय सिंह और दूसरे सत्र की अध्यक्षता डाॅ. संजय अग्रवाल ने की। 

पहले वक्ता के रूप में हिन्द इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज के कम्युनिटी मेडिसिन विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. रवि पचौरी ने कहा कि फाइलेरिया बीमारी फ्यूलेक्स और मैनसोनाइडिस प्रजाति के मच्छरों से होती है। यह मच्छर जब किसी मानव को काटता है तो यह एक पतले धागे जैसा परजीवी मानव शरीर में छोड़ता है। मादा परजीवी, नर परजीवी के संपर्क में आकर लाखों सूक्ष्म फाइलेरिया नामक भ्रूणों को जन्म देती है। यह माइक्रो फाइलेरिया रात के समय में प्रभावी होते हैं। उन्होंने कहा कि फाइलेरिया बीमारी एक छिपा छुपा हुआ दुश्मन है, क्योकि इसके लक्षण संक्रमण के 8 से -12 सालों बाद नजर आते हैं। ऐसी स्थिति में मानव शरीर के अंगों हाथ, पैर, स्तन, अंडकोष में सूजन बढ़ने लगती है। 

माइक्रोबॉयलॉजी विभाग के सहायक प्रो. डॉ. राकेश मुखिया ने फ्यूलेक्स और मैनसोनाइडिस प्रजाति के मच्छरों के जीवन चक्र की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि यह बीमारी मच्छरों द्वारा फैलती है, खासकर परजीवी क्यूलेक्स फैंटीगंस मादा मच्छर के जरिए। इंटरनल मेडिसिन विभाग के अध्यक्ष विभागाध्यक्ष प्रो. (डॉ.) निशांत कनोडिया ने कहा कि फाइलेरिया दुनिया की दूसरे नंबर की ऐसी बीमारी है जो बड़े पैमाने पर लोगों को दिव्यांग बना रही है। उन्होंने कहा कि जिन अंगों पर फाइलेरिया का प्रभाव होता है, उसकी त्वचा पर इसके जीवाणु तेजी से पनपते हैं है। इन जीवाणुओं की संख्या अधिक होने के कारण प्रभावित अंगों में दर्द, लालपन एवं रोगी को बुखार हो जाता है। फाइलेरिया प्रभावित अंगों में शुरूआत में सूजन के लक्षण होते हैं, बाद में यही सूजन स्थायी और लाइलाज हो जाती है। उन्होंने कहा कि इस बीमारी की वजह से किसी की मौत भले ही न हो, लेकिन इस बीमारी से व्यक्ति मृत के समान हो जाता है। 

दूसरे सत्र का शुभारंभ करते हुए सहायक प्रो. डॉ. एसके शर्मा ने कहा कि जब तक किसी व्यक्ति के फाइलेरिया से पीड़ित होने का पता चलता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। दुर्भाग्य की बात यह भी है कि इस बीमारी का कोई कारगर इलाज नहीं है। इसकी रोकथाम ही इसका समाधान है। उन्होंने कालाजार बीमारी के बारे में भी जानकारी देते हुए इसके कारण, लक्षण और उपचार के बार में बताया। उन्हाेंने कहा कि सीतापुर के आसपास के जिलों में फाइलेरिया के मरीजों ाका मिलना चिंता की बात है। 

डॉ. शोएब अनवर ने बताया कि फाइलेरिया के उन्मूलन के लिए केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय फाइलेरिया उन्मूलन नामक कार्यक्रम चलाया जा रहा है। फाइलेरिया परजीवी की औसतन आयु 4 से 6 वर्ष की होती है, इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को इस अभियान के दौरान पांच सालों तक लगातार फाइलेरिया से बचाव की दवा खानी चाहिए, जिससे कि वह फाइलेरिया जैसी घातक बीमारी से बच सके। 

पाथ संस्था के नोडल ऑफीसर डॉ. उदित मोहन ने बताया कि सामान्य लोगों में, जिनके शरीर में फाइलेरिया रागे के कीटाणु नहीं है, दवा सेवन से कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता है। दवा के सेवन से जब शरीर में फाइलेरिया कृमि मरते हैं तो बुखार, खुजली, उल्टी जैसे लक्षण हो सकते हैं जो स्वतः तीन से चार घंटे में समाप्त हो जाते हैं। इस लक्षण के होने पर इसका सामान्य इलाज किया जा सकता है। इसलिए घबराने की जरूरत नहीं है। हाइड्रोसिल का इलाज संभव है इसके मुफ्त आॅपरेशन की सुविधा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र एवं जिला अस्पताल पर मुफ्त उपलब्ध है। इससे बचाव के लिए घर के आस-पास पानी जमा न होने दें और सोते समय मच्छरदानी का प्रयोग करें। उन्होंने यह भी बताया कि यह दवा दो वर्ष से कम उम्र के बच्चों, गर्भवती और अत्यन्त गंभीर बीमारी से पीड़ित लोगों को नहीं दी जानी है, लेकिन जो लोग उच्च रक्त चाप, मधुमेह, अर्थराइटिस रोग की दवा का सेवन कर रहे हैं, वह इस दवा का सेवन अवश्य करें।

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